व्रत करना गीतानुसार कैसा है?
💠गीता में व्रत के विषय में 💠 भारत की अधिकांश जनता भक्ति,साधना और भगवान में विश्वास रखने वाली है साधक समाज भगवान से सभी प्रकार के लाभ प्राप्त करने के लिए कई प्रकार के व्रत किया करता है ❇ परंतु कभी-कभी साधक समाज के मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या व्रत करना सही है या गलत ❓❓ प्रश्न :- क्या एकादशी, कृष्ण अष्टमी या अन्य व्रत भी शास्त्रों में वर्जित हैं❓ उत्तर -श्रीमद्भगवत् गीता अध्याय 6 श्लोक 16 में मना किया है कि हे अर्जुन! यह योग (भक्ति) न तो अधिक खाने वाले का और न ही बिल्कुल न खाने वाले का अर्थात् यह भक्ति न ही व्रत रखने वाले, न अधिक सोने वाले की तथा न अधिक जागने वाले की सफल होती है। इस श्लोक में व्रत रखना पूर्ण रुप से मना है। सूक्ष्मवेद में कबीर परमेश्वर जी ने कहा है कि :- गुरूवाँ गाम बिगाड़े संतो, गुरूवाँ गाम बिगाड़े। ऐसे कर्म जीव कै ला दिए, बहुर झड़ैं नहीं झाड़े ।। शब्दार्थ :- परमेश्वर कबीर जी ने समझाया है कि तत्वज्ञानहीन गुरूओं ने गाँव के गाँव को शास्त्राविरूद्ध साधना पर लगाकर उनका जीवन नाश कर रखा है।भोली जनता को शास्त्रा विरूद्ध ...